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वृषभ (Taurus) लग्न

Taurus

वृषभ (Taurus) लग्न

वृषभ लग्न का प्रतीक बैल है और यह मेष के बाद क्षितिज पर उदित होने वाली दूसरी लग्न है। कालपुरुष में यह मुख और गर्दन का प्रतिनिधित्व करता है। इस लग्न में शुक्र ग्रह इंद्रियों का स्वामी होता है।

वृषभ चतुर्पद राशि है और इसके चार पैर कठिन परिस्थितियों में इसकी स्थिरता और सहनशक्ति को दर्शाते हैं।

वृषभ लग्न और उसका स्वामी

वृषभ लग्न का स्वामी शुक्र ग्रह है, जो जीवन को भोग, सौंदर्य और शालीनता के साथ जीने का संकेत देता है। वृषभ पृथ्वी तत्व की स्थिर प्रकृति और शुक्र की स्त्री ऊर्जा के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करता है। बैल स्वभाव से शांत, लेकिन अत्यंत शक्तिशाली और दृढ़ होता है।

वृषभ का चतुर्पद स्वभाव उसकी ताकत भी है और कमजोरी भी। इसके चार पैर इसे लंबे समय तक अपने मार्ग पर टिके रहने की शक्ति देते हैं, लेकिन यही गुण इसे ज़िद्दी और परिवर्तन के प्रति धीमा भी बना देता है।

वृषभ लग्न का तत्व और गुण

शुक्र ग्रह और पृथ्वी तत्व के कारण वृषभ लग्न में प्रजनन शक्ति और जीवन ऊर्जा का विशेष प्रभाव होता है। एक बार जब वृषभ की ऊर्जा किसी इच्छा की पूर्ति की ओर प्रवाहित हो जाती है, तो परिणाम निश्चित होता है — भले ही समय कितना भी लगे।

वृषभ की सहनशक्ति अधीरता को परास्त कर देती है। यह लंबे समय तक किसी एक विषय, व्यक्ति या लक्ष्य से जुड़ा रह सकता है। पृथ्वी इसका प्रमुख महाभूत है, जो इसे जड़ता और स्थिरता प्रदान करता है।

शुक्र और पृथ्वी के इस संयोजन से वृषभ को किसी कार्य पर बिना थके लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करने की अद्भुत क्षमता मिलती है। इस स्थिरता का अंतिम परिणाम अक्सर सुंदर, संतुलित और शुक्र के गुणों से परिपूर्ण होता है।

वृषभ लग्न का स्वभाव और दिशा

वृषभ लग्न की प्रकृति राजसिक होती है और इसकी प्रेरणा इच्छाओं की पूर्ति से आती है। यह लग्न कर्मशील, व्यावहारिक और भौतिक जीवन पर केंद्रित होती है।

वृषभ की ऊर्जा नकारात्मक ध्रुवीयता लिए होती है और भीतर की ओर प्रवाहित होती है। आत्ममंथन इस लग्न का मुख्य कार्य है। यह स्त्री प्रधान लग्न है और अपने उच्च कोमल स्वाद के अनुसार जीवन की सुंदर वस्तुओं की तलाश करता है।

यह लग्न रात्रि में अधिक सक्रिय हो जाता है और दक्षिण दिशा से जुड़ा माना जाता है।

वृषभ लग्न वाले लोग कलात्मक होते हैं, सौंदर्यबोध प्रबल होता है, वस्तुओं और सुख-सुविधाओं को संचित करते हैं और ऐसा वातावरण पसंद करते हैं जो स्थिरता, सामंजस्य और संतोष प्रदान करे।

वृषभ लग्न के चक्र और आयुर्वेदिक दोष

वृषभ लग्न हृदय क्षेत्र में स्थित अनाहत चक्र को नियंत्रित करता है। यह चक्र आनंद, प्रेम और सामंजस्य की भावनाओं को प्रसारित करता है।

शुक्र शब्द का शाब्दिक अर्थ प्रजनन तत्व भी है। प्रेम, करुणा और सुख की भावनाओं को नियंत्रित करते हुए शुक्र वृषभ को परम आनंद की ओर अग्रसर करता है।

अनाहत चक्र का तत्व वायु है, जो वृषभ लग्न में भी प्रमुख भूमिका निभाता है। वायु की गति वृषभ की ऊर्जा को सक्रिय करती है, जिससे यह अपने सिद्धांतों और निर्णयों पर अडिग रहता है।

वृषभ लग्न और नक्षत्र

वृषभ लग्न तीन नक्षत्रों को समेटे हुए है — कृत्तिका, रोहिणी और मृगशिरा। कृत्तिका के अधिष्ठाता देव अग्नि हैं, रोहिणी के ब्रह्मा और मृगशिरा के चंद्रमा।

अग्नि तीव्र इच्छाओं और भावनाओं का प्रतीक है, और ब्रह्मा से जुड़कर यह सृजन और भोग की प्रवृत्ति को बढ़ाता है।

मृगशिरा अपने खोजी स्वभाव और चंद्रमा के प्रभाव से सौंदर्य, सुख और रात्रिकालीन भोगों की ओर आकर्षण देता है। इन तीनों नक्षत्रों का सम्मिलित प्रभाव वृषभ लग्न की मूल प्रवृत्ति को निर्धारित करता है।

वृषभ लग्न की शारीरिक विशेषताएँ

शुक्र के प्रभाव से वृषभ लग्न वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व आकर्षक होता है। उनकी गर्दन मोटी और सुदृढ़ होती है। कद मध्यम होता है और सामान्यतः स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

इनका रंग गोरा होता है, आँखें चमकदार, होंठ सुडौल और बाल घने व गहरे रंग के होते हैं। कंधे मज़बूत होते हैं और शरीर में स्वाभाविक गरिमा और सुंदरता झलकती है।

सकारात्मक और नकारात्मक गुण

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सकारात्मक गुण

धैर्य वृषभ की पहचान है। यह व्यक्ति कार्य में अडिग रहता है और रिश्तों व सपनों के प्रति निष्ठावान होता है। गहरी सोच, विश्वसनीयता और स्थायित्व इसके प्रमुख गुण हैं। यह रणनीतिक, संतुलित और सौंदर्यप्रिय होता है।

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नकारात्मक गुण

अत्यधिक आत्मविश्वास इसे ज़िद्दी बना सकता है। यह परिवर्तन को स्वीकार करने में धीमा होता है और कभी-कभी जड़ हो जाता है। अत्यधिक भोग-विलास इसकी कमजोरी बन सकता है।

वृषभ लग्न में प्रत्येक ग्रह का महत्व

वृषभ लग्न में सूर्य

सूर्य चतुर्थ भाव का स्वामी होकर भावनात्मक स्थिरता और सौभाग्य देता है।

वृषभ लग्न में चंद्रमा

तीसरे भाव का स्वामी होकर भावुकता और अस्थिरता ला सकता है।

वृषभ लग्न में मंगल

सातवें और बारहवें भाव का स्वामी होकर संबंधों में चुनौती ला सकता है।

वृषभ लग्न में बुध

दूसरे और पाँचवें भाव का स्वामी होकर बुद्धि और वाणी को सशक्त करता है।

वृषभ लग्न में गुरु

आठवें और ग्यारहवें भाव का स्वामी होकर अशुभ प्रभाव दे सकता है।

वृषभ लग्न में शुक्र

प्रथम और छठे भाव का स्वामी होकर मिश्रित फल देता है।

वृषभ लग्न में शनि

नवम और दशम भाव का स्वामी होकर राजयोग बनाता है और सफलता देता है।

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