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तुला (Libra) लग्न

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तुला (Libra) लग्न

तुला क्षितिज पर उदित होने वाली सातवीं राशि है। इसका प्रतीक तराजू पकड़े हुए व्यक्ति का है, जो इस बात का संकेत देता है कि तुला लग्न वाले लोग अपने भीतर और बाहर की ऊर्जा के बीच संतुलन बनाने में स्वाभाविक रूप से कुशल होते हैं।

कालपुरुष के शरीर में तुला लग्न नाभि के नीचे का भाग और कमर के निचले हिस्से को नियंत्रित करता है। तुला लग्न को जुक, धाता, वणिल और थौली जैसे नामों से भी जाना जाता है।

तुला एक चर (चलायमान) राशि है, जैसा कि तराजू के लगातार ऊपर-नीचे होने से समझा जा सकता है। यह राशि प्रेरणादायक होती है और चुनौतियों से डरने के बजाय उन्हें अपनाती है। मानसिक स्तर पर तुला बहुत लचीली होती है और नए कार्य अपनाने, मौजूदा कार्य को बेहतर बनाने या दोनों को एक साथ संभालने की क्षमता रखती है।

तुला लग्न और उसका स्वामी

तुला लग्न का स्वामी शुक्र ग्रह है, जो जीवन में सौंदर्य, शालीनता और आकर्षण का संकेत देता है। तुला लग्न वाले लोग अपने व्यवहार और जीवनशैली में संतुलन और मर्यादा बनाए रखना पसंद करते हैं, ताकि वे व्यावहारिक और वास्तविक बने रहें।

शुक्र तराजू का स्वामी है और अपने जातकों को भोग-विलास की ओर आकर्षित करता है। लेकिन यही शुक्र यह भी संकेत देता है कि इन इंद्रिय सुखों से ऊपर उठकर व्यक्ति आत्मिक विकास और उच्च ज्ञान की ओर बढ़ सकता है।

तुला लग्न का तत्व, रंग और गुण

तुला वायु तत्व की राशि है, इसलिए यह अपने बौद्धिक विचारों और समझ के सहारे आगे बढ़ती है। वायु हर जगह फैलने वाली होती है और मानव मन के गहरे कोनों में छुपी बुद्धि को बाहर लाने का काम करती है। यही कारण है कि तुला विवेक और समझ में श्रेष्ठ मानी जाती है।

महर्षि पराशर ने तुला का रंग ‘नीला’ बताया है। नीला रंग आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और अंतर्ज्ञान का प्रतीक है। तुला संतुलन की तलाश करती है, लेकिन कई बार अपनी स्वतंत्र इच्छा के कारण अव्यवस्थित या जोखिम भरे निर्णय भी ले सकती है। ऐसे में वह भावनात्मक रूप से उदास या भ्रमित महसूस कर सकती है।

तुला का जीवन यही सिखाता है कि कभी-कभी आगे उड़ान भरने के लिए दो कदम पीछे हटना ज़रूरी होता है। जब अव्यवस्था समाप्त हो जाती है, तब तुला स्थिरता, बुद्धिमत्ता और शांति प्राप्त करती है — जो नीले रंग के मुख्य गुण हैं।

तुला लग्न का स्वभाव और दिशा

तुला पुरुष और राजसिक स्वभाव की राशि है। यह सकारात्मक ऊर्जा से भरी होती है और अपनी शक्ति को बाहरी दुनिया में व्यक्त करती है। तुला आत्मचिंतन में ज़्यादा न उलझकर अपने इच्छित लक्ष्यों को पाने के लिए सक्रिय रहती है।

तुला जीवन के हर क्षेत्र में सामंजस्य और शांति चाहती है और समाधान खोजने पर विश्वास रखती है। लेकिन चर राशि होने के कारण कई बार निर्णय लेने और फिर उस पर टिके रहने में कठिनाई महसूस कर सकती है।

तुला द्विपाद राशि है, इसलिए यह दिशा बदलने और तेजी से आगे बढ़ने में सक्षम होती है। यह पश्चिम दिशा की स्वामी मानी जाती है और कर्म व बुद्धि के संतुलन से जीवन की अव्यवस्थाओं को शांत करने की क्षमता रखती है।

तुला लग्न के चक्र और आयुर्वेदिक दोष

तुला लग्न अनाहत चक्र से संबंधित है, जिसे हृदय चक्र भी कहा जाता है। यह चक्र प्रेम, करुणा और संतुलन का प्रतीक है।

वायु तत्व इस चक्र और तुला लग्न दोनों से जुड़ा हुआ है, जिसके कारण तुला अपने बौद्धिक निर्णयों और भावनात्मक समझ के सहारे जीवन की दिशा तय करती है।

तुला लग्न और नक्षत्र

तुला लग्न चित्रा, स्वाती और विशाखा — इन तीन नक्षत्रों को समेटे हुए है। चित्रा नक्षत्र का प्रतीक बाघ है, जो देवी दुर्गा का वाहन माना जाता है और इच्छाशक्ति का संकेत देता है।

स्वाती को ‘स्वयं चलने वाला तारा’ कहा जाता है, जो तुला को स्वतंत्र निर्णय लेने और बेचैनी के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

विशाखा ‘उद्देश्य का तारा’ है, जो तुला को अपने लक्ष्य ऊँचे रखने और उन्हें पूरा करने की शक्ति देता है।

तुला लग्न की शारीरिक विशेषताएँ

तुला लग्न वाले लोग आकर्षक और संतुलित व्यक्तित्व के होते हैं। इनकी कद-काठी सामान्यतः लंबी और शरीर पतला होता है।

इनका चेहरा चौड़ा, नाक उभरी हुई और आँखें सुंदर होती हैं। शरीर सुडौल और आकर्षक होता है, और उम्र बढ़ने के बावजूद ये युवा दिखाई देते हैं।

सकारात्मक और नकारात्मक गुण

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सकारात्मक गुण

तुला वायु तत्व की राशि है और परिवर्तन को पसंद करती है। ये लोग जिज्ञासु, बुद्धिमान और सीखने के इच्छुक होते हैं। इनमें एकाग्रता की अद्भुत शक्ति होती है और ये किसी भी कार्य को सुंदर ढंग से पूरा करने की क्षमता रखते हैं। इनके भीतर रचनात्मकता, आकर्षण और कूटनीति होती है, जिससे ये अच्छे संबंध बना पाते हैं। शुक्र के प्रभाव से इन्हें सौंदर्य, कला, फैशन और भोग-विलास से प्रेम होता है।

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नकारात्मक गुण

तुला का अस्थिर स्वभाव इन्हें निर्णय लेने में भ्रमित कर सकता है। कभी-कभी ये अपनी अंतःप्रेरणा पर भरोसा नहीं कर पाते। अधिक भावुकता और इंद्रिय सुखों में डूब जाना इनके लिए असंतुलन ला सकता है। मानसिक तनाव का प्रभाव पेट, कमर और मूत्र तंत्र पर पड़ सकता है। संतुलन और आत्म-अनुशासन सीखना इनके लिए आवश्यक है।

तुला लग्न में प्रत्येक ग्रह का महत्व

तुला लग्न में सूर्य

सूर्य और शुक्र में सामंजस्य नहीं होता। सूर्य 11वें भाव का स्वामी होने के कारण तुला लग्न के लिए अशुभ माना जाता है।

तुला लग्न में चंद्रमा

चंद्रमा 10वें भाव का स्वामी है और केंद्र भाव का स्वामी होने के कारण राजयोग बना सकता है। यह ग्रह तुला लग्न के लिए शुभ फल दे सकता है।

तुला लग्न में मंगल

मंगल दूसरे और सातवें भाव का स्वामी है और मारक ग्रह माना जाता है, इसलिए यह तुला लग्न के लिए अशुभ होता है।

तुला लग्न में बुध

बुध नवम और बारहवें भाव का स्वामी है। नवम भाव शुभ होने के कारण बुध तुला लग्न के लिए लाभकारी माना जाता है।

तुला लग्न में गुरु

गुरु तीसरे और छठे भाव का स्वामी है। ये दोनों भाव क्रूर माने जाते हैं, इसलिए गुरु तुला लग्न के लिए अशुभ प्रभाव देता है।

तुला लग्न में शुक्र

शुक्र लग्न का स्वामी है और अष्टम भाव का भी स्वामी है। लग्न स्वामी होने के कारण यह ग्रह कुल मिलाकर शुभ माना जाता है।

तुला लग्न में शनि

शनि चौथे और पाँचवें भाव का स्वामी है और योगकारक ग्रह बनता है। सही स्थिति में यह राजयोग दे सकता है।

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