जानें शुभ-लाभ के पर्व दीपावली का महत्व और पूजा-विधि:

पंचांग के अनुसार, शुभ-लाभ का पर्व 'दीपावली' को कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। दीयों का ये त्योहार अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में हर वर्ष मनाया जाता है। इस वर्ष दीपावली की तिथि को लेकर थोड़ा असमंजस हो रहा है क्योंकि इस वर्ष अमावस्या तिथि पर सूर्य ग्रहण भी लग रहा है। यदि शास्त्रों की माने तो, ग्रहण के दौरान किसी भी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य नहीं किये जाते है। प्रकाश का ये त्योहार मुख्य रूप से लक्ष्मी और गणेश जी के पूजन के लिए माना जाता है।
इस वर्ष दीपावली 24 अक्टूबर 2022 को पूरे भारत में मनायी जाएगी और इस दिन यदि आप पूरे विधि-विधान के साथ पूजा करेंगे तो आपके जीवन में समृद्धि का मार्ग खुलेगा और आपकी सभी मनोकामना भी पूरी होगी। भारत में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है।
दीपावली शब्द मुख्य रूप से संस्कृत के दो शब्दों 'दीप' अर्थात 'दिया' और 'आवली' अर्थात 'पंक्ति' या 'श्रृंखला' के मिश्रण से बनी हुई है। दीपावली त्योहार के नाम को लोग अलग-अलग तरह से बोलते हैं जैसे कुछ लोग "दीपावली" तो कुछ "दिपावली" ; वही कुछ लोग "दिवाली" तो कुछ लोग "दीवाली" शब्द का प्रयोग करते है। यहाँ इस बात को समझ लेना आवश्यक है कि कोई भी शुद्ध शब्द का प्रयोग उसके अर्थ पर निर्भर करता है । यहाँ शुद्ध शब्द "दीपावली" है , जो 'दीप' और 'पंक्ति' से मिलकर बना है । 'दिवाली' शब्द का प्रयोग भी गलत है क्योंकि इसका उपयुक्त शब्द 'दीवाली' है और 'दिवाली' का तो अर्थ भी इससे भिन्न होता है। ऐसा कह सकते है कि दीपावली का बिगड़ा हुआ रूप 'दीवाली' है दिवाली नहीं; परंतु विशुद्ध एवं सबसे उपयुक्त शब्द 'दीपावली' ही है।
महत्व:
दीपावली नेपाल और भारत में सबसे सुन्दर त्यौहारों में से एक है। दीपावली की तैयारी लोग बहुत पहले से शुरू कर देते है जैसे अपने घरों को साफ कर उन्हें दीपावली के लिए सजाते हैं। ऐसा माना जाता है कि माता लक्ष्मी को साफ-सफाई बहुत पसंद है इसलिए उनके स्वागत के लिए घरों की साफ-सफाई बहुत जरुरी है। नेपाल के लोगों के लिए यह त्योहार इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन से नेपाल में नये वर्ष की शुरुआत मानी जाती है।
दीपावली के उपलक्ष पर सभी लोग अत्यंत उत्साहित रहते हैं लोग खरीदारी करते हैं, खासकर इस समय लोग कार और सोने के गहने जैसी महंगी वस्तुएँ की खरीदारी करते हैं। इसके साथ ही लोग अपने परिवारों के लिए कपड़े, उपहार, उपकरण, रसोई के बर्तन आदि की भी खरीदारी करते हैं। इस त्योहार के दिन लोग अपने परिवार के सदस्यों और दोस्तों को उपहार के रुप में आम तौर पर मिठाइयाँ व सूखे मेवे देते हैं। लोग अपने बच्चों को इस दिन बुराई पर अच्छाई की विजय होने की कहानी सुनाते है।
घर की महिलाएं और लड़कियाँ घर को सजाती है तथा फर्श और दरवाजे के पास रंगोली बनाती हैं। घर के लोग पूरे घर को दीयों से सजाते हैं तथा पटाखें भी जलाते हैं। क्षेत्रों के अनुसार लोगों की प्रथाओं और रीति-रिवाजों में बदलाव देखा जा सकता हैं लेकिन श्रद्धा सबकी बराबर ही होती हैं। इस दिन परिवार के सभी लोग धन-समृद्धि की देवी-देवता लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते हैं।
मान्यताएं:
दीपावली का अपना एक धार्मिक महत्व हैं। इसकी अपनी अलग-अलग मान्यताएं और कई कथा भी दीपावली से जुड़ी हुई हैं:
प्राचीन हिंदू ग्रन्थ रामायण के अनुसार ऐसा माना जाता है कि दीपावली के दिन ही श्रीराम 14 वर्ष का वनवास काटकर माता सीता और लक्ष्मण को लेकर वापस आये थे। इसके अलावा महाभारत कथा के अनुसार 12 वर्ष के वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी के प्रतीक के रूप में मनाते है। जानें शुभ-लाभ के पर्व दीपावली का महत्व और पूजा-विधि:
दीपावली को सभी भगवान विष्णु की पत्नी तथा धन-समृद्धि की देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ मानते हैं। माता लक्ष्मी के साथ-साथ सभी भक्त बाधाओं को दूर करने वाले गणेश; संगीत, साहित्य की प्रतीक सरस्वती; और धन प्रबंधक कुबेर की पूजा करके उनको प्रसाद अर्पित करते हैं।
भारत के पूर्वी क्षेत्र उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में हिन्दू लक्ष्मी की जगह माँ काली की पूजा करते हैं, और वहां इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं। मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान कृष्ण से जुड़ा हुआ भी मानते हैं। भारत के पश्चिम के कुछ भागों में और उत्तरी भागों में दीपावली के त्योहार को एक नये हिन्दू वर्ष की शुरुआत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता हैं।
इस त्योहार के दिन दीप जलाने की प्रथा के पीछे भी कई अलग-अलग कारण और कहानियाँ हैं। राम और सीता के वापस लौटने की खुशी और बुराई पर अच्छाई की जीत होने की खुशी में लोग खुशी के दीये अपने घर में जलाते है। एक और पुरानी कहानी के अनुसार भगवान विंष्णु ने जब नरसिंह रूप धारण कर के हिरण्यकश्यप का वध किया था तो इसी खुशी में लोग दीये जलाते है। इसके साथ ही ऐसा भी माना जाता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के पश्चात माता लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए। जिस खुशी में धनतेरस भी मनाया जाता है।
सूर्य ग्रहण कब से कब तक
इस साल का आखिरी सूर्य ग्रहण 25 अक्टूबर के दिन होने वाला है। सूर्य ग्रहण 25 अक्टूबर 2022 को शाम के 4 बजकर 29 मिनट से शुरू होकर 5 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। ये सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा जिसके कारण सूतक काल मान्य नहीं होगा। ये सूर्य ग्रहण मुख्य रूप से यूरोप, उत्तर-पूर्वी अफ्रीका और पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों से ही दिखाई देगा। इसके अलावा भारत में सूर्य ग्रहण अगर दिखाई देगा तो नई दिल्ली, बेंगलुरु, कोलकाता सहित कुछ जगहों पर दिखाई दे सकता है।
दीपावली पर लक्ष्मी पूजन का महत्व:
दीपावली के दिन मुख्य रूप से माता लक्ष्मी और गणपति की पूजा की जाती है जिसका अपना एक विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि यदि इस दिन पूरे विधि-विधान के साथ पूजा न की जाए तो पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। माता लक्ष्मी धन की देवी है और यदि उनकी पूजा सच्ची श्रद्धा से की जाए तो धन-समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। दीपावली का त्योहार कार्तिक अमावस्या के दिन होता है और इस दिन माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने से समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जो भी व्यक्ति माँ लक्ष्मी की दीपावली वाले दिन पूजा करते हैं उनकी सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और उनके जीवन से धन-ऐश्वर्य और समृद्धि कभी भी कम नहीं होता है।
दीपावली के दिन गणेश पूजन का महत्व:
गणपति को प्रथम पूजनीय देवता होने का वरदान प्राप्त है और किसी भी पूजा को तभी संपूर्ण माना जाता है जब भगवान गणेश की पूजा सबसे पहले होती है। दीपावली के दिन गणपति की पूजा करने से मन और मस्तिष्क को शांति मिलती है तथा भक्तों को सद्बुद्धि का वरदान प्राप्त होता हैं।
लोग दीपावली के दिन माँ लक्ष्मी के साथ गणपति की पूजा इसलिए करते हैं ताकि उनको धन के सही इस्तेमाल की सदबुद्धि प्राप्त कर सके। गणपति की पूजा करते हुए लोग यही प्रार्थना करते हैं कि उन्हें सद्बुद्धि का आशीर्वाद प्राप्त हो सके। यदि आप दीपावली के दिन साफ़ और स्वच्छ मन से पूजा करते हैं तो आपके जीवन में हमेशा खुशहाली बनी रहेगी।
पूजा विधि:
१. दीपावली के दिन मुख्य रूप से माँ लक्ष्मी और गणेश जी का पूजा किया जाता है। 5 दिनों का ये पवन पर्व शुरू करने से पहले घर की साफ-सफाई अच्छे तरीके से कर लें। माता लक्ष्मी को साफ-सफाई बहुत पसंद है इसलिए माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए अपने घर की साफ-सफाई आवश्यक है। पूजा विधि शुरू करने के लिए सबसे पहले आप पूजा स्थान को साफ़ करें और एक चौकी को साफ कर उस चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं।
२. उसके बाद उस चौकी पर माँ लक्ष्मी और गणेश की मूर्ति की स्थापना करें। यदि संभव हो तो मिट्टी की बनी नयी मूर्ति स्थापित करें और ध्यान रहें कि गणेश जी के दाए तरफ ही माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें।
३. इनके साथ आपको भगवान कुबेर, मां सरस्वती और कलश की भी स्थापना करनी चाहिए।
४. पूजा के स्थान पर और चौकी पर गंगाजल छिड़के। लाल या पीले फूल से भगवान गणेश की पूजा करें और उनके मंत्र - "ऊँ गं गणपतये नम: " का जाप करें।
५. गणेश जी के मंत्रों के जाप से ही पूजा का आरंभ करना चाहिए।
६. भगवान गणेश को तिलक लगाएं खासकर दूर्वा तथा मोदक तो अवश्य ही अर्पित करें।
७. माता लक्ष्मी की पूजा भगवान गणेश के साथ ही करें, पूजा के दौरान माता लक्ष्मी को लाल सिंदूर का तिलक लगाएं और श्री सूक्त मंत्र का पाठ करें। इनके साथ ही आप धन कुबेर और मां सरस्वती का भी पूजन करें।
८. माँ लक्ष्मी और गणेश जी की विधि विधान से पूजा करने के बाद मां काली की पूजा भी रात्रि के समय में किया जाता है।
९. पूजा विधि समाप्त होने के बाद माता लक्ष्मी और गणेश की आरती करें और उन्हें भोग अर्पित करें। आरती के चढ़ाए हुए भोग को परिवारजनों में वितरित करें।
१०. माता लक्ष्मी और गणेश जी के पूजा के बाद दीये प्रज्वलित करें। दीया जलाने के क्रम में सबसे पहले आप लक्ष्मी जी के सामने 5 या 7 घी के दीये प्रज्वलित करें।
११. हम सभी को दीपावली के दिन सच्चे और साफ मन से पूजा-अर्चना करनी चाहिए। तभी सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होगा और पूजा सफल मानी जाएगी।
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