मुहूर्त ज्योतिष: शुभ समय में किया काम क्यों अधिक फलदायी होता है

एक बीज बोने का समय होता है। फसल काटने का समय होता है। नदी में ज्वार का समय होता है। और मनुष्य के जीवन के हर महत्वपूर्ण कार्य का भी एक समय होता है।
यह विचार केवल आस्था का नहीं, विज्ञान का है। प्रकृति में सब कुछ समय के अनुसार चलता है। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण समुद्र में ज्वार-भाटा लाता है। सूर्य की स्थिति ऋतुओं को बदलती है। ग्रहों की दशाएं मनुष्य के जीवन को प्रभावित करती हैं। तो जब हम कोई महत्वपूर्ण कार्य आरंभ करते हैं, तब का ग्रह-नक्षत्र संयोग उस कार्य की दिशा और गति को प्रभावित क्यों नहीं करेगा?
यही मुहूर्त ज्योतिष का मूल सिद्धांत है।
आज का शुभ मुहूर्त और राहुकाल जानने के लिए वैदिक ऋषि पंचांग देखें।
मुहूर्त क्या है और इसका वैदिक आधार क्या है?
मुहूर्त शब्द दो शब्दों से बना है: "मुहु" अर्थात क्षण और "अर्त" अर्थात अर्थ या प्रयोजन। अर्थात वह क्षण जिसका एक विशेष प्रयोजन हो। वैदिक गणना में एक मुहूर्त 48 मिनट का होता है और एक दिन में 30 मुहूर्त होते हैं। इनमें से कुछ शुभ होते हैं, कुछ अशुभ।
मुहूर्त चिंतामणि जो मुहूर्त ज्योतिष का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ है, उसमें कहा गया है:
"शुभे मुहूर्ते यत् कार्यं तत् सिद्ध्यति न संशयः। अशुभे चेत् कृतं कार्यं विफलं स्यान्न संशयः।।"
अर्थात: शुभ मुहूर्त में किया गया कार्य निश्चित रूप से सिद्ध होता है। अशुभ समय में किया गया कार्य विफल होता है। इसमें कोई संदेह नहीं।
यह केवल धार्मिक मान्यता नहीं है। इसके पीछे एक गहरी वैज्ञानिक सोच है। जब हम कोई कार्य आरंभ करते हैं, उस समय के ग्रह-नक्षत्र उस कार्य की नींव में जुड़ जाते हैं। जैसे एक भवन की नींव यदि दृढ़ हो तो भवन टिकाऊ होता है, वैसे ही शुभ मुहूर्त में आरंभ किया गया कार्य अनुकूल ऊर्जा से प्रारंभ होता है और उसे गति मिलती है।
अथर्ववेद में काल (समय) को परम शक्ति कहा गया है:
"काल एव भुवनानि सर्वा, काल एव समभरत् पृथिव्याम्। काल एव जनयित्वा जातः, कालाद् भूतं भव्यं च जायते।।"
अर्थात: काल ही समस्त लोकों का सृजन करता है। काल ही पृथ्वी को धारण करता है। काल ही जन्म देता है और काल से ही भूत, वर्तमान और भविष्य उत्पन्न होते हैं।
जब समय स्वयं इतनी बड़ी शक्ति है, तो उसे समझकर चलना ज्ञान है।
पंचांग: मुहूर्त की नींव के पांच स्तंभ
मुहूर्त निकालने के लिए पंचांग देखा जाता है। पंचांग का अर्थ है पांच अंग। जिस प्रकार एक मनुष्य के शरीर के सभी अंग मिलकर उसे स्वस्थ बनाते हैं, उसी प्रकार पंचांग के पांचों अंग मिलकर किसी समय की शुभता या अशुभता निर्धारित करते हैं।
तिथि: चंद्रमा की यात्रा का क्षण
तिथि सूर्य और चंद्रमा के बीच की कोणीय दूरी से बनती है। प्रत्येक 12 डिग्री के अंतर पर एक नई तिथि आरंभ होती है। एक मास में 30 तिथियां होती हैं।
वैदिक ज्योतिष में तिथियों को पांच वर्गों में बांटा गया है:
नंदा तिथियां (1, 6, 11): आनंद, उत्सव और नई शुरुआत के लिए श्रेष्ठ। विवाह, नामकरण और शुभ समारोहों के लिए उत्तम।
भद्रा तिथियां (2, 7, 12): स्थायित्व देने वाली तिथियां। गृह प्रवेश और दीर्घकालिक निवेश के लिए अच्छी।
जया तिथियां (3, 8, 13): विजय और संघर्ष की तिथियां। प्रतियोगिताओं और कठिन कार्यों के लिए उपयोगी।
रिक्ता तिथियां (4, 9, 14): इन तिथियों में शुभ कार्य टालें। "रिक्त" अर्थात खाली, इनमें आरंभ किए कार्य अधूरे रह सकते हैं।
पूर्णा तिथियां (5, 10, 15/पूर्णिमा, अमावस्या): पूर्णिमा सभी शुभ कार्यों के लिए उत्तम है। अमावस्या पितृकार्यों के लिए।
वार: सप्ताह के सात दिन और उनके अधिपति
प्रत्येक वार का एक ग्रह-स्वामी होता है और उसी के अनुसार उस दिन की ऊर्जा निर्धारित होती है।
गुरुवार को सर्वाधिक शुभ वार माना जाता है क्योंकि बृहस्पति देवगुरु हैं और उनकी दृष्टि हर शुभ कार्य को बल देती है।
नक्षत्र: चंद्रमा की 27 मंजिलें
27 नक्षत्रों में चंद्रमा विचरण करता है। जिस नक्षत्र में चंद्रमा हो उसे उस दिन का नक्षत्र कहते हैं। मुहूर्त में नक्षत्र सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।
विवाह के लिए श्रेष्ठ नक्षत्र: रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्रपद, रेवती।
गृह प्रवेश के लिए श्रेष्ठ नक्षत्र: रोहिणी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, उत्तर फाल्गुनी, अनुराधा, रेवती।
व्यापार आरंभ के लिए श्रेष्ठ नक्षत्र: पुष्य (इसे व्यापार का सर्वश्रेष्ठ नक्षत्र माना जाता है), रोहिणी, हस्त, अनुराधा।
यात्रा के लिए श्रेष्ठ नक्षत्र: अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती।
योग: सूर्य और चंद्रमा की संयुक्त गति
योग की गणना सूर्य और चंद्रमा की देशांतर-स्थिति के योग से होती है। 27 योगों में से कुछ अत्यंत शुभ हैं जैसे सिद्ध, शुभ, शुक्ल और ब्रह्म योग। और कुछ अशुभ जैसे विष्कुंभ, व्याघात, व्यतीपात। मुहूर्त चुनते समय शुभ योग का होना अतिरिक्त बल देता है।
करण: तिथि का आधा भाग
एक तिथि के दो भाग होते हैं और प्रत्येक भाग को करण कहते हैं। 11 करणों में से बव, बालव, कौलव, तैतिल और गर करण शुभ माने जाते हैं। विष्टि (भद्रा) करण अत्यंत अशुभ है और इसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
आज का संपूर्ण पंचांग: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण एक साथ देखें।
शुभ और अशुभ समय: जो हर किसी को पता होना चाहिए
राहुकाल: दिन का वह भाग जब कोई शुभ कार्य न करें
प्रत्येक दिन लगभग डेढ़ घंटे का एक काल होता है जिसे राहुकाल कहते हैं। इस समय राहु का प्रभाव सबसे अधिक होता है और इसमें आरंभ किए गए कार्यों में बाधाएं आती हैं।
ध्यान रहे कि यह समय स्थान और ऋतु के अनुसार बदलता है। सटीक राहुकाल के लिए पंचांग देखना जरूरी है।
यमगंड और गुलिक काल
राहुकाल के अतिरिक्त यमगंड और गुलिक काल भी अशुभ समय होते हैं। यमगंड में किए गए कार्यों में यम-पीड़ा अर्थात बाधा और रोग का भय रहता है। गुलिक काल में शनि का प्रभाव रहता है।
अभिजित मुहूर्त: वह समय जो हमेशा शुभ है
मुहूर्त चिंतामणि में कहा गया है:
"अभिजिन्नाम मुहूर्तः स्यात् सर्वकार्यार्थसाधकः। मध्याह्ने सोमवारेऽपि सर्वकार्येषु शुभप्रदः।।"
अर्थात: अभिजित नाम का मुहूर्त सभी कार्यों को सिद्ध करने वाला है। दोपहर का यह समय सोमवार को भी सभी कार्यों में शुभ फल देता है।
प्रतिदिन दोपहर के समय लगभग 12 बजे से 12:48 तक अभिजित मुहूर्त होता है। यह वह समय है जब सूर्य आकाश के ठीक मध्य में होता है और उसकी ऊर्जा सर्वाधिक प्रबल होती है। यदि कोई अन्य शुभ मुहूर्त न मिले तो इस समय में आरंभ किया गया कार्य शुभ माना जाता है। बुधवार को अभिजित नहीं होता, यह एकमात्र अपवाद है।
चौघड़िया देखें: दिन के हर पहर का शुभ-अशुभ समय एक नजर में।
किस कार्य के लिए कौन सा मुहूर्त श्रेष्ठ है
विवाह मुहूर्त
विवाह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। इसीलिए विवाह मुहूर्त पंचांग के सभी पांचों अंगों को देखकर निकाला जाता है। केवल नक्षत्र या वार देखना पर्याप्त नहीं है।
विवाह के लिए आदर्श संयोग: गुरुवार या शुक्रवार को उत्तर फाल्गुनी, रोहिणी या हस्त नक्षत्र में शुभ तिथि हो और गुरु-शुक्र अस्त न हों, तो यह संयोग सर्वश्रेष्ठ है।
एक महत्वपूर्ण बात जो अनेक लोग नहीं जानते: गुरु और शुक्र का अस्त होना विवाह के लिए अशुभ है। जब बृहस्पति और शुक्र सूर्य के निकट होने के कारण दिखाई नहीं देते, उस काल में विवाह नहीं करना चाहिए। इसीलिए वर्ष के कुछ महीनों में विवाह नहीं होते।
इसके अतिरिक्त वर-वधू की कुंडलियों में मंगल दोष, राहु-केतु की स्थिति और गुण मिलान भी विवाह मुहूर्त को प्रभावित करते हैं। सबकी कुंडली अलग होती है इसलिए एक ही मुहूर्त सबके लिए समान रूप से शुभ नहीं होता।
गृह प्रवेश मुहूर्त
नया घर मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। वास्तु शास्त्र और मुहूर्त ज्योतिष दोनों मिलकर गृह प्रवेश के लिए सही समय निर्धारित करते हैं।
गृह प्रवेश के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि उत्तरायण काल (मकर संक्रांति से कर्क संक्रांति तक) में गृह प्रवेश करना अधिक शुभ है क्योंकि इस काल में सूर्य उत्तर की ओर गतिमान होता है जो उन्नति का प्रतीक है।
गृह प्रवेश के लिए नक्षत्र: पुष्य नक्षत्र गृह प्रवेश के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। इसके अतिरिक्त रोहिणी, उत्तर फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा और उत्तरभाद्रपद भी उत्तम हैं।
किस दिन न करें: मंगलवार और शनिवार को गृह प्रवेश टालें। इन दिनों क्रमशः मंगल और शनि का प्रभाव होता है जो नए आवास में तनाव और विवाद की संभावना बढ़ाता है।
व्यापार और नई दुकान का शुभारंभ
व्यापार में सफलता के लिए पुष्य नक्षत्र को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों में पुष्य को "पुष्टि देने वाला" कहा गया है। जब पुष्य नक्षत्र गुरुवार को आता है तो उसे गुरु पुष्यामृत योग कहते हैं जो व्यापार आरंभ के लिए अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग है।
नई दुकान या व्यापार शुरू करने के लिए बुधवार भी उत्तम है क्योंकि बुध ग्रह व्यापार, संचार और बुद्धि का कारक है। बुधवार को बुध की शक्ति सर्वाधिक प्रबल होती है।
वाहन खरीद का मुहूर्त
वाहन खरीदना जीवन में एक महत्वपूर्ण निर्णय है और इसके लिए भी मुहूर्त देखा जाता है।
वाहन खरीद के लिए श्रेष्ठ: बुधवार या गुरुवार को शुभ नक्षत्र में, शुक्ल पक्ष में वाहन खरीदना लाभकारी होता है।
धनतेरस: यह एकमात्र दिन है जब विशेष रूप से वाहन और धातु की वस्तुएं खरीदी जाती हैं। त्रयोदशी तिथि पर धन्वंतरि देव की कृपा होती है और इस दिन खरीदी गई वस्तुएं समृद्धि लाती हैं। 2026 में यह विशेष महत्व रखता है।
किस वाहन के लिए कौन सा ग्रह: दोपहिया वाहन के लिए मंगल की अनुकूल स्थिति और चारपहिया के लिए शुक्र और बुध दोनों को देखा जाता है।
यात्रा का मुहूर्त
मुहूर्त सार ग्रंथ में कहा गया है:
"अश्विनी-पुनर्वसु-पुष्य-हस्त-ज्येष्ठा-मूल-श्रवण-धनिष्ठा-रेवत्यः। एते नक्षत्रे यात्रा शुभफलदा भवति।।"
अर्थात: अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, श्रवण, धनिष्ठा और रेवती नक्षत्रों में यात्रा शुभ फल देती है।
उत्तर दिशा की यात्रा बुधवार और गुरुवार को, पूर्व दिशा की यात्रा सोमवार और शनिवार को, दक्षिण दिशा की यात्रा मंगलवार को और पश्चिम दिशा की यात्रा शुक्रवार को अनुकूल मानी जाती है। राहुकाल में यात्रा आरंभ करने से बचें।
नामकरण संस्कार
शिशु का नामकरण उसके जन्म के 11वें दिन से लेकर 1 वर्ष के भीतर करना शास्त्रसम्मत है। नामकरण के लिए अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, रेवती नक्षत्र उत्तम हैं।
ज्योतिष शास्त्र में बालक के जन्म नक्षत्र के आधार पर नाम का पहला अक्षर निर्धारित किया जाता है। इससे नाम और नक्षत्र की ऊर्जा एक दिशा में काम करती है और बालक का जीवन अधिक सुगम होता है।
त्योहारों में मुहूर्त का महत्व
यह बात जानना बहुत जरूरी है कि त्योहारों पर होने वाली पूजा भी सही मुहूर्त में करने से अधिक फलदायी होती है।
दिवाली पर लक्ष्मी पूजन: दीपावली पर लक्ष्मी पूजन प्रदोष काल में करना सर्वश्रेष्ठ है। प्रदोष काल वह समय है जब सूर्यास्त के बाद लगभग 1.5 से 2 घंटे तक का समय होता है। इस समय किया गया लक्ष्मी पूजन सर्वाधिक फलदायी माना जाता है।
धनतेरस पर खरीदारी: त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ और वृष लग्न या वृष राशि में खरीदारी करना विशेष शुभ है क्योंकि वृष राशि शुक्र की राशि है और वह धन-समृद्धि की संकेतक है।
नवरात्रि की नवमी पर हवन: महानवमी पर हवन के लिए अभिजित मुहूर्त या विजय मुहूर्त (दोपहर बाद का) उत्तम है।
गणेश चतुर्थी पर स्थापना: गणेश प्रतिमा की स्थापना मध्याह्न काल में करना शास्त्रसम्मत है। गणेश जी का जन्म मध्याह्न में हुआ था इसलिए यही समय उनकी स्थापना के लिए श्रेष्ठ है।
रक्षाबंधन पर राखी बांधना: भद्रा काल में राखी न बांधें। भद्रा (विष्टि करण) के समाप्त होने के बाद ही राखी बांधना शुभ होता है। इसीलिए हर वर्ष रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त अलग होता है।
श्रावण सोमवार पर शिव पूजा: इन सोमवारों पर प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या अभिजित मुहूर्त में शिव पूजा करना सर्वाधिक लाभदायक है।
आज का होरा मुहूर्त देखें: हर घंटे का ग्रह-स्वामी और उसके अनुसार कौन से कार्य करें।
व्यक्तिगत कुंडली और मुहूर्त: एक महत्वपूर्ण अंतर
यहाँ एक ऐसी बात है जो अधिकांश लोग नहीं जानते।
पंचांग से जो मुहूर्त निकाला जाता है वह सामान्य मुहूर्त है जो सबके लिए होता है। लेकिन व्यक्तिगत मुहूर्त वह होता है जो किसी एक व्यक्ति की जन्म कुंडली को देखकर उसके लिए विशेष रूप से निकाला जाता है।
उदाहरण के लिए: यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल अत्यंत बलवान है तो मंगलवार उसके लिए अशुभ नहीं होगा। या यदि किसी की कुंडली में शनि अनुकूल है तो शनिवार को भी वह व्यक्ति शुभ कार्य कर सकता है।
इसीलिए विवाह मुहूर्त निकालते समय केवल सार्वजनिक पंचांग नहीं देखते। वर और वधू दोनों की कुंडलियां देखकर वह मुहूर्त चुना जाता है जो दोनों के लिए अनुकूल हो।
एक अनुभवी ज्योतिषी पंचांग के पांचों अंगों के साथ-साथ व्यक्ति की कुंडली में लग्न, चंद्र राशि, ग्रहों की दशा और गोचर भी देखता है। तब जाकर एक संपूर्ण और विश्वसनीय मुहूर्त निकलता है।
अपनी विस्तृत कुंडली यहाँ देखें: अपनी लग्न, दशा और गोचर जानें ताकि आप अपने लिए सही मुहूर्त समझ सकें।
आधुनिक जीवन में मुहूर्त: व्यावहारिक उपयोग
कुछ लोग सोचते हैं कि मुहूर्त केवल पूजा और धार्मिक कार्यों के लिए है। लेकिन वैदिक परंपरा में हर महत्वपूर्ण निर्णय और कार्य के लिए समय की महत्ता बताई गई है।
नौकरी ज्वाइनिंग: नई नौकरी में प्रवेश करने का दिन महत्वपूर्ण है। गुरुवार और बुधवार नई नौकरी शुरू करने के लिए श्रेष्ठ हैं। राहुकाल में पहले दिन दफ्तर में प्रवेश न करें।
परीक्षा और इंटरव्यू: परीक्षा देने के लिए घर से निकलते समय का मुहूर्त देखें। बुध और गुरु की अनुकूल होरा में घर से निकलना अध्ययन और बुद्धि को बल देता है।
संपत्ति पंजीकरण: भूमि और संपत्ति का पंजीकरण शुक्ल पक्ष में, रोहिणी या उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में करना शुभ है। इससे संपत्ति में बरकत रहती है और विवाद नहीं होते।
बैंक खाता खोलना या निवेश: बुधवार को बुध के होरा में वित्तीय कार्य करना लाभकारी है। पुष्य नक्षत्र में निवेश करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
चिकित्सा और शल्यक्रिया: शस्त्र-कर्म के लिए मंगलवार और शनिवार से बचना चाहिए। रविवार को सूर्य का होरा हो तो शस्त्र-चिकित्सा के लिए उचित है। साथ ही शल्यक्रिया वाले दिन का नक्षत्र भी जांचा जाना चाहिए।
मुहूर्त का सार: समय को साथी बनाएं
ब्रहत पाराशर होरा शास्त्र में महर्षि पाराशर ने कहा है:
"उदये लग्नबलं दृष्ट्वा शुभग्रहयुतेक्षितम्। मुहूर्तं साधयेद् विद्वान् सर्वकार्यार्थसिद्धये।।"
अर्थात: ज्ञानी व्यक्ति लग्न का बल देखकर और शुभ ग्रहों की युति-दृष्टि को जानकर मुहूर्त साधे, तब समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।
मुहूर्त ज्योतिष का उद्देश्य जीवन को भाग्य के भरोसे छोड़ना नहीं है। इसका उद्देश्य यह है कि हम अपने प्रयास और परिश्रम को सही समय पर लगाएं ताकि वह अधिकतम फल दे।
एक किसान चाहे जितनी मेहनत करे, यदि वह बेमौसम बीज बोएगा तो फसल नहीं होगी। लेकिन सही ऋतु में बोया बीज कम परिश्रम में भी उग आता है। मुहूर्त भी यही करता है: आपके परिश्रम को सही मौसम में लगाता है।
समय एक शक्ति है। उसे पहचानना बुद्धिमानी है। और पंचांग वह ज्ञान है जो इस शक्ति को समझने में मदद करता है।
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