दीपावली 2025: सिर्फ एक पर्व नहीं, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का संगम

जैसे ही अक्टूबर या नवंबर का महीना आता है, देश भर में एक अलग ही खुशनुमा माहौल बनने लगता है। बाज़ारों की रौनक, घरों से आती मिठाइयों की खुशबू, और हर कोने में टिमटिमाते दीयों की हल्की-हल्की रौशनी… यह माहौल किसी और चीज़ का नहीं, बल्कि हमारी सबसे प्यारी और रौशनी से भरी त्योहार दीपावली का होता है।
दिवाली, यानी रौशनी का त्योहार, सिर्फ पटाखे फोड़ने या नए कपड़े पहनने का मौका भर नहीं है। यह हमारे लिए एक नए साल का आगाज़ है, एक मौका है जब हम अपने परिवार के साथ मिलकर खुशियाँ मनाते हैं और धन की देवी माँ लक्ष्मी का स्वागत करते हैं।
लेकिन इससे पहले आइये जानते हैं इस वर्ष दिवाली किस दिन है और लक्ष्मी-गणेश पूजा का मुहूर्त क्या है -
दीपावली 2025: लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त और सही समय
आप सभी के मन में यह सवाल होगा कि इस साल दीपावली कब मनाई जाएगी और माँ लक्ष्मी का पूजन किस समय करना सबसे शुभ होगा। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस साल दीपावली का महापर्व सोमवार, 20 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा।
यहाँ आपकी पूजा के लिए अमावस्या तिथि और शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी दी गई है:
अमावस्या तिथि कब से कब तक?
अमावस्या तिथि प्रारंभ: 20 अक्टूबर 2025, सोमवार को दोपहर 3 बजकर 47 मिनट से।
अमावस्या तिथि समाप्त: 21 अक्टूबर 2025, मंगलवार को शाम 5 बजकर 57 मिनट तक।
चूंकि लक्ष्मी पूजन के लिए अमावस्या तिथि का प्रदोष काल में होना आवश्यक है, इसलिए 20 अक्टूबर की शाम को ही पूजा करना शास्त्र सम्मत है।
लक्ष्मी पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ लग्न और शुभ समय
माँ लक्ष्मी का पूजन स्थिर लग्न (Static Lagna) में करना सबसे उत्तम माना जाता है। यहाँ स्थिर लग्न और अन्य शुभ चौघड़िया मुहूर्त दिए गए हैं:
| पूजा का काल | शुभ मुहूर्त |
|---|---|
| प्रदोष काल मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ) | शाम 7 बजकर 42 मिनट से रात 9 बजकर 42 मिनट तक |
| दिन का स्थिर लग्न (कुंभ) | दोपहर 2 बजकर 48 मिनट से शाम 4 बजकर 24 मिनट तक |
| मध्य रात्रि (निशीथ काल) | देर रात 2 बजकर 08 मिनट से 4 बजकर 16 मिनट तक |
दिन और रात के अन्य शुभ चौघड़िया मुहूर्त
यदि आप स्थिर लग्न के मुहूर्त में पूजा नहीं कर पाते हैं, तो इन चौघड़िया मुहूर्तों में भी पूजा करना शुभ रहेगा:
लाभ (दोपहर): दोपहर 3 बजकर 18 मिनट से शाम 4 बजकर 45 मिनट तक
अमृत (शाम): शाम 4 बजकर 45 मिनट से 6 बजकर 13 मिनट तक
लाभ (रात्रि): रात 10 बजकर 51 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक
क्या ये सिर्फ रीति-रिवाज हैं या इनके पीछे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य?
लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इन सदियों पुरानी परंपराओं के पीछे का रहस्य क्या है? हम घर की इतनी ज़ोरदार सफाई क्यों करते हैं? दीये जलाना इतना ज़रूरी क्यों है? क्या ये सिर्फ रीति-रिवाज हैं, या इनमें कोई गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य छिपा है?
असल में, दिवाली हमारे पूर्वजों की प्राचीन विज्ञान और गहरी आध्यात्मिक समझ का अद्भुत मिश्रण है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इस पर्व के हर छोटे-बड़े काम को ऐसे रचा है कि यह न केवल हमारे मन को शांति दे, बल्कि हमारे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भी सर्वश्रेष्ठ हो।
आइए, इस लेख में हम इसी सत्य की खोज करते हैं और जानते हैं कि क्यों दिवाली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का एक संपूर्ण संगम है। जब आप इन रहस्यों को जान जाएंगे, तो अगली बार आपका दीया जलाना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक उत्सव बन जाएगा।
घर की सफाई: सिर्फ धूल झाड़ना नहीं, जीवन की ऊर्जा को बदलना
दिवाली से कुछ हफ़्ते पहले ही, हमारे घरों में एक बड़ा अभियान शुरू हो जाता है—साफ़-सफाई का महा-अभियान! अलमारियाँ खाली होती हैं, जाले हटाए जाते हैं, और घर का हर कोना चमका दिया जाता है। यह काम दिखने में थकाऊ लग सकता है, लेकिन इसके पीछे कारण बहुत गहरे हैं।
आध्यात्मिक कारण: दरिद्रता को हटाकर, समृद्धि को बुलाना
आध्यात्मिक नज़रिए से, घर की सफाई एक प्रतीकात्मक कार्य है। हमारे धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जहाँ स्वच्छता होती है, वहीं देवत्व का वास होता है।
नकारात्मकता को हटाना: घर में पड़ी पुरानी, टूटी हुई या इस्तेमाल न होने वाली चीज़ें रुकी हुई ऊर्जा पैदा करती हैं। यह ऊर्जा जीवन में रुकावटें लाती है और इसे ही दरिद्रता या दुर्भाग्य का प्रतीक माना जाता है। दिवाली से पहले इन्हें हटाना, अपने जीवन से अतीत के बोझ और नकारात्मक विचारों को दूर करने जैसा है।
लक्ष्मी जी का स्वागत: देवी लक्ष्मी को स्वच्छता और सकारात्मकता बहुत प्रिय है। मान्यता है कि लक्ष्मी जी केवल साफ़-सुथरे घरों में ही प्रवेश करती हैं। यह सफाई, हमारे मन और आत्मा को भी साफ़ करने जैसा है, ताकि हम खुले दिल से समृद्धि और ख़ुशी का स्वागत कर सकें। यह न केवल धन, बल्कि विचारों और रिश्तों की समृद्धि का भी प्रतीक है।
ऊर्जा का प्रवाह: घर के कोनों को साफ़ करने से ऊर्जा का प्रवाह तेज़ होता है। यह हमें मानसिक रूप से तरोताज़ा करता है और हम नए साल की शुरुआत एक साफ़ मन और उत्साह के साथ करते हैं।
वैज्ञानिक कारण: स्वास्थ्य सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन
मानसून के बाद की समस्या: भारत में दिवाली का समय अक्सर मानसून के ठीक बाद आता है। नमी वाले मौसम में घरों में हानिकारक बैक्टीरिया, फफूँदी और तरह-तरह के कीटाणु तेज़ी से पनपते हैं। ये जीव सर्दियों के आगमन से पहले कई तरह की बीमारियाँ (जैसे एलर्जी और श्वसन संबंधी रोग) पैदा कर सकते हैं।
प्राकृतिक कीट नियंत्रण: घर के हर कोने, अलमारी के पीछे और अँधेरे स्थानों की सफाई करने से इन हानिकारक जीवों और उनके अंडों को नष्ट किया जाता है। पुराने, अप्रयुक्त सामान को हटाने से उन्हें छिपने की जगह नहीं मिलती। यह एक तरह का प्राकृतिक और जैविक कीट नियंत्रण है, जो बिना किसी हानिकारक केमिकल के, हमारे घर को स्वस्थ बनाता है।
सूर्य का स्वागत: सफाई के बाद जब हम अपने घर के दरवाज़े और खिड़कियाँ खोलते हैं, तो ताज़ी हवा और सर्दियों की हल्की धूप घर में आती है। धूप एक प्राकृतिक कीटाणुनाशक है जो बची हुई नमी और कीटाणुओं को भी खत्म करती है।
इस तरह, दिवाली की सफाई हमें आध्यात्मिक रूप से स्वच्छ बनाती है और साथ ही बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करती है।
दीयों का जादू: घर रोशन करना और शुद्धिकरण
दिवाली का सबसे खूबसूरत पहलू है मिट्टी के दीये जलाना। लाखों दीयों की एक साथ जगमगाहट देखना किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। दीया, जो इतना छोटा है, वह इतनी बड़ी खुशियाँ और पवित्रता कैसे ला देता है?
आध्यात्मिक कारण: अज्ञान पर ज्ञान की जीत
दीया सिर्फ एक प्रकाश स्रोत नहीं है; यह हमारे जीवन दर्शन का प्रतीक है।
प्रकाश की विजय: दीये की लौ अंधेरे पर प्रकाश की विजय को दर्शाती है। यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी निराशा या अंधकार हो, ज्ञान और सकारात्मकता की एक छोटी सी लौ भी उसे दूर कर सकती है।
आत्म-ज्ञान: दीये की लौ ऊपर की ओर उठती है, जो हमें उच्चता और आत्म-ज्ञान की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है। दीया खुद जलकर दूसरों को रौशनी देता है, जो निस्वार्थता और त्याग का सबसे बड़ा पाठ है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारे भीतर भी एक आंतरिक आत्मा है, जिसे ज्ञान के प्रकाश से रोशन करना है।
देव आह्वान: सनातन धर्म में प्रकाश को परमेश्वर का स्वरूप माना गया है। दीये जलाकर हम अपनी पूजा और प्रार्थनाओं में देवताओं का आह्वान करते हैं।
वैज्ञानिक कारण: हवा का शुद्धिकरण और मनोवैज्ञानिक शांति
दीयों को सरसों के तेल या शुद्ध गाय के घी से जलाने के पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण छिपे हैं।
हवा में कीटाणुओं का नाश:
जब शुद्ध घी (जिसे आयुर्वेद में बहुत पवित्र माना गया है) जलता है, तो यह पर्यावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है।
सरसों के तेल या घी को जलाने से जो धुआँ निकलता है, उसमें ऐसे तत्व होते हैं जो हवा में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस और सूक्ष्म जीवों को खत्म करते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि दीया जलाने से आस-पास का वातावरण 99% तक शुद्ध हो जाता है। यह एक प्राचीन विधि है जिससे वायु शुद्धिकरण किया जाता था।
मनोवैज्ञानिक शांति: दीये की पीली और गर्म रौशनी का हमारे मन पर बहुत शांत प्रभाव पड़ता है। यह रौशनी हमारी आँखों को आराम देती है और तनाव कम करती है। मोमबत्ती या इलेक्ट्रिक लाइट की तेज़ रौशनी के बजाय, दीये की हल्की, स्थिर लौ ध्यान के लिए एक आदर्श वातावरण बनाती है।
पारिस्थितिक संतुलन:
मिट्टी के दीये 100% बायोडिग्रेडेबल होते हैं। वे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते।
घी और तेल प्राकृतिक ईंधन हैं, जो हानिकारक रसायन नहीं छोड़ते।
दीये जलाना इस बात का प्रमाण है कि हमारे पूर्वज जानते थे कि कैसे स्वच्छता, स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता को एक ही कार्य से साधा जा सकता है।
रंगोली की कला: सकारात्मक ऊर्जा का स्वागत कालीन
घर के आँगन या मुख्य दरवाज़े पर रंगोली बनाना दिवाली का एक ज़रूरी हिस्सा है। यह रंग-बिरंगी, जटिल कलाकृति हमें बहुत खुशी देती है। लेकिन यह केवल सजावट नहीं है, बल्कि ऊर्जा विज्ञान का एक बेहतरीन नमूना है।
आध्यात्मिक कारण: दैवीय कम्पन और स्वागत
रंगोली को देवताओं और देवियों के स्वागत का पवित्र तरीका माना जाता है।
सकारात्मक कम्पन: रंगोली के जटिल, ज्यामितीय और सममितीय पैटर्न को इस तरह से डिज़ाइन किया जाता है कि वे उस स्थान पर एक सकारात्मक और दैवीय कम्पन पैदा करें। ये पैटर्न 'यंत्रों' के सिद्धांत पर आधारित होते हैं, जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आकर्षित करने का काम करते हैं।
दैवीय सीमा: रंगोली घर की सीमा बनाती है, जो घर में प्रवेश करने वाली नकारात्मक शक्तियों या ऊर्जाओं को बाहर ही रोक देती है और केवल शुभ ऊर्जा को ही अंदर आने देती है।
पंचभूत का संतुलन: रंगोली बनाने में इस्तेमाल होने वाले रंग प्राकृतिक होते थे, जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—पंचभूतों का प्रतीक हैं। इन रंगों का उपयोग उस जगह पर ऊर्जा का संतुलन स्थापित करता है।
वैज्ञानिक कारण: मस्तिष्क के लिए ध्यान और रंग चिकित्सा
मस्तिष्क के लिए ध्यान : रंगोली बनाते समय जिस एकाग्रता की ज़रूरत होती है, वह एक तरह का सक्रिय ध्यान है। यह दिमाग को शांत करता है, तनाव कम करता है और रचनात्मकता को बढ़ाता है।
रंग चिकित्सा : रंगोली में इस्तेमाल होने वाले चमकीले और जीवंत रंग रंग चिकित्सा का काम करते हैं। नारंगी, पीला, लाल जैसे रंग ऊर्जा और उत्साह बढ़ाते हैं, जबकि हरा रंग शांति और संतुलन लाता है। ये रंग आँखों को बहुत भाते हैं और हमारे मूड को तुरंत खुशनुमा बना देते हैं।
सूक्ष्म दबाव: ज़मीन पर बैठकर रंगोली बनाते समय, हमारे हाथों और उँगलियों पर हल्का दबाव पड़ता है, जो एक तरह का एक्यूप्रेशर भी है।
रंगोली कला का यह सिद्धांत दिखाता है कि कैसे हमारे पूर्वज ऊर्जा, कला और मनोविज्ञान को एक साथ जोड़कर सकारात्मक वातावरण बनाते थे।
लक्ष्मी पूजा: धन का सम्मान और कर्म का सिद्धांत
दिवाली का मुख्य आकर्षण लक्ष्मी पूजा है। यह पूजा केवल धन माँगने की रस्म नहीं है, बल्कि धन के प्रति हमारे दृष्टिकोण को शुद्ध करने का एक गहरा अनुष्ठान है।
आध्यात्मिक कारण: कर्म, धर्म और समृद्धि का संगम
धन का सम्मान : लक्ष्मी पूजा हमें सिखाती है कि धन केवल भौतिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक दैवीय ऊर्जा है जिसका हमें सम्मान करना चाहिए। धन को केवल कमाने के लिए नहीं, बल्कि धर्म (नैतिकता) और सही कर्म के साथ इसका उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
बुद्धि और शुभ-लाभ: लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी (बुद्धि के देवता) की पूजा की जाती है। इसका संदेश साफ है—बिना बुद्धि (गणेश) के अर्जित किया गया धन (लक्ष्मी) टिकता नहीं है। समृद्धि तभी आती है जब उसके पीछे विवेक और सही निर्णय लेने की क्षमता हो।
हिसाब-किताब का समय: व्यापारी वर्ग दिवाली के दिन अपने पुराने खाते-बही बंद करते हैं और नए बही-खाते खोलते हैं। यह एक कर्म का हिसाब रखने जैसा है—पिछले साल आपने धन का उपयोग कैसे किया, और आने वाले साल में आप इसे कैसे बढ़ाएँगे। यह पूरी तरह से स्व-मूल्यांकन पर आधारित है।
वैज्ञानिक कारण: वित्तीय अनुशासन और नए साल की शुरुआत
वित्तीय अनुशासन : पुराने खातों को बंद करना और नए शुरू करना एक बेहतरीन वित्तीय प्रबंधन का तरीका है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने खर्चों और निवेशों का लेखा-जोखा रखना चाहिए। यह व्यावसायिक जगत में नए संकल्प लेने और पिछले साल की गलतियों से सीखने का समय है।
समय चक्र का बदलाव: हिन्दू पंचांग के अनुसार दिवाली के आसपास ही कार्तिक मास शुरू होता है, जिसे ऊर्जा और पवित्रता का महीना माना जाता है। यह समय प्रकृति में एक बड़े बदलाव का होता है। पूजा और अनुष्ठान इस बड़े समय चक्र के बदलाव के साथ तालमेल बिठाने में मदद करते हैं।
रंग, पकवान और परंपराएँ: सामूहिक ऊर्जा का उत्सव
दिवाली की हर परंपरा, चाहे वह पकवान बनाना हो या रिश्तेदारों से मिलना, सामूहिक ऊर्जा को शुद्ध और संतुलित करने का काम करती है।
मिठाइयाँ और पकवान: इस समय बनने वाले पकवान, जैसे लड्डू, मठरी, आदि, अक्सर घी, सूखे मेवे और अनाज से बनाए जाते हैं। ये सभी पोषक तत्व सर्दियों के लिए शरीर को तैयार करते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। ये स्वादिष्ट व्यंजन वैज्ञानिक रूप से ऊर्जा से भरपूर होते हैं।
नए कपड़े और शगुन: नए कपड़े पहनना और एक-दूसरे को शगुन देना मनोवैज्ञानिक रूप से आत्म-सम्मान और खुशी को बढ़ाता है। नएपन का स्वागत करने से हमारे अंदर भी एक नई ऊर्जा का संचार होता है।
सामूहिक मिलन: परिवार और रिश्तेदारों से मिलना सामाजिक बंधन को मज़बूत करता है और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा होता है। सामाजिक रूप से सक्रिय रहने से तनाव कम होता है।
दिवाली का त्योहार हमें याद दिलाता है कि हमारे प्राचीन रीति-रिवाज किसी अंधविश्वास पर आधारित नहीं थे, बल्कि वे ठोस विज्ञान, स्वास्थ्य लाभ और गहन दर्शन का परिणाम थे। यह पर्व हमें साल में एक बार रुककर, आत्म-शुद्धि करने, अपने आस-पास के वातावरण को शुद्ध करने, और समृद्धि का सम्मान करना सिखाता है।
दिवाली की हर रस्म हमें बताती है कि जीवन में आध्यात्मिक और भौतिक दोनों तरह की सफलता के लिए ज्ञान, कर्म, स्वच्छता और विवेक बहुत ज़रूरी हैं।
इस दिवाली, जब आप घर की सफाई करें, तो समझें कि आप अपने जीवन से नकारात्मकता हटा रहे हैं। जब आप एक दीया जलाएं, तो इसे सिर्फ एक परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि अज्ञान पर ज्ञान की जीत के गहरे अर्थ के साथ मनाएं। जब आप रंगोली बनाएं, तो अपने घर में सकारात्मक ऊर्जा का कम्पन पैदा करें।
यह दिवाली, सिर्फ़ बाहरी रौशनी नहीं, बल्कि अपने भीतर के प्रकाश को भी जगाने का संकल्प लें! शुभ दीपावली!
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